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Monday, September 13, 2010

एक करोड की बोतल

इस उपन्‍यास के माध्‍यम से हम 'एक गधे की आत्‍मकथा' लिखने वाले, उर्दू कथा साहित्‍य में अपनी अनूठी रचनाशीलता के लिए बहुचर्चित उपन्‍यासकार, प्रगतिशील और य‍थार्थवादी नजरिए से लिखे जानेवाले साहित्‍य के प्रमुख पक्षधरों में से एक, कृष्‍नचंदर के लेखन से परिचित हुए। (पुस्‍तक के परिचय से)

इस पुस्‍तक का पेपरबैक संस्‍करण जो कि मूल पुस्‍तक की अविकल प्रस्‍तुति होने का दावा करता है, कहीं रास्‍ते में किसी स्‍टेशन से खरीदी गई थी। 

उपन्‍यास मुम्‍बई नगरिया की दो बिल्‍कुल धुर असमान जीवन स्‍तर का बहुत ही खूबसूरती से चित्रण करता है। कथा की नायिका झुग्‍गी बस्‍ती की गरीबी से अचनाक नाटकीय ढंग से एक करोडपति आदमी की बेटी की समस्‍त सुविधाऍं और वसीयत पा जाती है। यही कहानी का प्रस्‍थान बिंदु है। 


इस कहानी के माध्‍यम से कृश्‍नचंदर ने दुर्दम्‍य गरीबी, बेहिसाब अमीरी, बेरोजगारी, मनुष्‍य की आशा, आकांक्षा, प्‍यार, दुनियादारी और मनुष्‍य की आर्थिक स्थिति बदलने पर उसके सारे के सारे मानसिक एंकाउन्‍ट्स में होने वाले परिवर्तनों को बखूबी दिखाया है। 

जीवन की भयावह सच्‍चाइयों को अत्‍यंत रोमांटिक लहजे में पेश किया है। इसमें उन्‍होंने नारी के समस्‍त कोमल मनोभावों एवं उसकी आंतरिक पीडा को मार्मिक अभिव्‍यक्ति दी है। वास्‍तव में कृष्‍नचंदर का यह उपन्‍यास मानव-मन की दुर्बलताओं का दर्पण तो है ही, इसमें सामाजिक विघटन एवं कुंठा से उत्‍पन्‍न वे घिनौने प्रसंग भी हैं, जो हमें चिंतन के नए छोरों तक ले जाकर रचनात्‍मक पुनर्रचना के लिए प्रेरित भी करते हैं।

भाषा सहज सरल है। ऐसा गांभीर्य भी है जो उबाता नहीं। कहीं कहीं ऐसी गूढता जो अपनी सहजता से कायल करती है। एक बार पढना शुरु करने के बाद पाठक खुद ब खुद सरकता जाता है।

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प्रस्‍तुत है पुस्‍तक से कुछ  रेखांकित अंश । 

"बयासी वर्ष का सर बोमन एक हँसमुख बुड्ढा था। उसके सुंदर बरताव में इस दरजा बराबरी और खादारी थी जो बहुत ज्‍यादा दौलत होने या बिल्‍कुल न होने की सूरत में पायी जाती है।"
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"अच्‍छा है कि भगवान ने मानव को एक मजबूत खोपडी में छिपाया है, जहॉं से उसकी अंदरुनी क्रिया दिखाई नहीं देती। मान लो इंसान की खोपडी कॉंच की बनी होती, और उस पर कोई ऐसी तरकीब निकल आती जिसमें हर इंसानी खयल और अमल की दिमागी तस्‍वीर टेलीविजन की तरह दिखाई दे जाती तो इंसान की समाजी जिंदगी असंभव हो जाती।"
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"इंसान कितनी जल्‍दी अपने आपको बदले हुए हालात के लायक बना लेना चाहता है। खासकर जब हालात अच्‍छे हों। केवल नीचे गिरते समय इंसान उलझन, दुख, पीडा और कठिनाई महसूस करता है, क्‍योंकि इंसान को गिरावट प्रिय नहीं है।" 
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"जिंदगी एक फूल होती है जो मुरझा जाती है। जिंदगी एक पत्‍थर होती है और घिस जाती है, जिंदगी लोहा होती है और गिर जाती है, जिंदगी आंसू होती है और गिर जाती है, जिंदगी महक होती है और बिखर जाती है, जिंदगी समंदर होती है जिस पर लहर दर लहर खराशें पडती रहती हैं। खराशें सर बोमन, जैसे किसी ने पानी को चाकू से काट दिया हो।" 
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"जिंदा रहने का यह उसूल बहुत पुराना है कि इंसान जिस वातावरण में रहे वहीं के ढंग अपनाए।" 
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"मानव चेष्‍टा और परिश्रम से चमकता है, सिर्फ अंदरुनी योग्‍यता ही सबकुछ नही है....

आसमान  केवल वह नहीं होता जो बाहर खुले में दिखाई देता है, आसमान वह भी होता है, जो छत के नीचे पाया जाता है, जो दीवारों पर मकडी की भांति सरकता है, फर्श पर कीडे की तरह चलता है, और भूख बनकर खाली ऑंतों में रेंगता है।" 
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"मोहब्‍बत के लिए अजनबीपन बेहद अच्‍छा है। इसलिए शुरु के कुछ महीने मियॉ-बीवी के बहुत अच्‍छे गुजरते हैं फिर जब वह सुहाने अजनबी दिन रोजमर्रा की गहरी जानकारी में बदल जाते हैं तो घृणा शुरु होती है, क्‍योंकि गहरी पहचान में खूबियॉं ही नहीं जानी जातीं, बल्कि त्रुटियॉं भी पहचान ली जाती हैं, जिनकी गिनती इंसानी स्‍वभाव में खूबियों के मुकाबले में दस गुना अधिक होती है।"
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"ये सब लोग अलग-अलग धर्म, नस्‍ल, रंग और सभ्‍यता तथा संस्‍कृति से संबंधित थे, ल‍ेकिन न जाने क्‍यों इंदू को ऐसा लगता था, जैसे ये सब एक ही बीज से फटे हैं, इन सबके स्‍वभाव एक-से थे, विचार एक-से थे, पसंद-नापसंद एक-सी थी, और दृष्टि कीडा-एक सा था। लगता था किसी एक ही मशीन से ढाले गए हैं।" 
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"हम दोनों का यों सोचना गलत था, खुशी बोतल में बंद होकर सागर की लहरों पर उछलती हुई किसी को नहीं मिलती है। खुशी को अपने हाथों से जीतना पडता है, इन दोनों हाथों से।"
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पुस्‍तक का नाम - एक करोड की बोतल 
लेखक - कृष्‍नचंदर 
पहला संस्‍करण : 1988
पॉचवां : 2009 

राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.
1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग
नई दिल्‍ली द्वारा प्रकाशित 
मूल्‍य : 50 रु. 

9 comments:

  1. पुस्तक पढ़ने योग्य है, निश्चय ही।

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  2. bilkul sahi kaha praveen ji ne........... aise rachnayen kuchh prerna hi chhodte hain pathko ke man me .......

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  3. I appreciate your lovely post, happy blogging!

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  4. "यूरोप के नारी-स्वातंत्र्य को भारतीय परिवेश में लागू नहीं किया जा सकता। आदिवासी, दलित, निम्न जातियों की स्त्रियों की पीडा को समझने के लिए अलग नजरिए से चीजों को देखना होगा। श्रमशील स्त्रियों की चिंताओं को आधुनिक विचार के दायरे में लाना होगा। हालांकि इन स्त्रियों के उध्दार के लिए कोई अलग से रूप-रेखा समाज में दिखाई नहीं देती"
    [वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई के साथ चन्दन राय की बातचीत]
    एक बार हस्तक्षेप.कॉम भी देखें
    http://hastakshep.com

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  5. आलेख पुस्तक पढने की रुचि जगा गया।

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  6. प्रेरणा - दायक पड़ कर अच्छा लगा !

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  7. ख़ुशी को जितना पड़ता है तभी वो हमको मिल सकती है बिलकुल सोलह आने सही बात कही गई है !

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