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Thursday, October 7, 2010

अभिनन्दन का उद्योग-पर्व

बाबा नागार्जुन की अप्रतिम व्यँग्य रचना ’ अभिनन्दन ’ पढ़ना अपने आपमें एक अनुभव है । साहित्यजगत विशेषकर हिन्दी साहित्यकारों के मध्य चलते घाल मेल और अभिनन्दन, सम्मानों के आँतरिक सत्य को बेरहमी और चुटीले ढँग से इस उपन्यास में उकेरते हैं, बाबा नागार्जुन । ऎसा नहीं है कि नागार्जुन हिन्दी-रचनाकारों के किसी असँतुष्ट घड़े से सम्बन्ध रखते रहे हों, और यह पुस्तक उनके असँतोष की कुँठा की उपज हो ।-Nagarjun साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत बाबा नागार्जुन ने सम्मान, अलँकरण की परवाह  कभी से न की !  श्री वैद्यनाथ मिश्र ( 1911-1998 ) छपासग्रस्त भी न थे,  लेखक के रूप में वह हिन्दी में नागार्जुन, मैथिली में यात्री और बाँग्ला में बैजनाथ के नाम को अमर कर गये ।  उनकी पहचान सदैव एक आवेगशील, प्रगतिशील रचनाकार की रहेगी, आम जनता से एक अभिजात्य दूरी बनाये रखने की अपेक्षा वह कभी और किसी बिन्दु पर सामाजिक मुक्ति-सँघर्ष में अपनी हिस्सेदारी से नहीं चूके ।


वाणी प्रकाशन को इसे छापने की अनुमति देते हुये  (उनकी अपनी हस्तलिपि में) उन्होंनें स्वयँ ही लिखा है, कि. Image0001अस्तु यहाँ प्रस्तुत है, उनके उपन्यास ’ अभिनन्दन ’ के  प्रथम अध्याय उद्योग-पर्व का आरँभिक डेढ़ पेज...
" कविवर मृगांक ने सोचा - बारह पांचे साठ। साठ सौ रूपये । कम नहीं होते है साठ सौ रूपये । साल भर में इतनी रकम तो दस उपन्यास भी नहीं खींच सकते ।
मनसाराम अपने-आप कुलांचें भरने लगा-जायेंगे कहां ? मृगांक ना कर देगा तो दूसरा फिर कौन हां करेगा ? अभिनन्दन का प्रसंग छिड़ते ही किस मिनिस्टर की जीभ लार नहीं टपकाती ।
और वह लार !
अन्दर से एक तीसरी आवाज आयी, अनहद नाद की तीसरी किस्म - उस लार को सहेजने के लिए महापात्र की आवश्यकता पड़ती है... अपनी कीर्ति का बखान सुनना होता था तो राजा पालतू कवियों को इशारा करता था । तू किस राजा का पालतू कवि है, मृगांक ?
मैं ! कविवर मृगांक ? पंडित मुचकुन्द मिश्र जिसका असली नाम है ? मै पालतू हूं ? किसके दिये निवाले गटकता हूं मै ? और प्रजातन्त्र के इस युग में राजा भला रह कहां गया । न राजा, न प्रजा । सभी पब्लिक है, अवाम, जन साधारण ! सहस्रशीर्षा पूरूषः सहस्राक्षः सहस्र पादकृहे कोटिशीर्ष, हे कोटिबाहु, हे कोटिचरण...!
लिहाफ दाहिने पैर से उपर सिमट गया था । बायें पैर का अंगूइा लिहाफ के अन्दर से ही मसहरी के डंडे को छू रहा था । बाहर ‘शुक्लपक्ष की तेरहस की गाढ़ी चांदनी फैली थी । दीवार के तीनों रोशनदान सजग थे । जंगलों और किवाड़ों के भी कांच इस वक्त अपनी सफाई का सबूत दे रहे थे ।
हे कोटिशीर्ष हे कोटिबाहु, हे  कोटिचरण... जन गण मन अधिनायक जय हे..  भारत भाग्य विधाता... पंजाब, सिन्धु, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंग.... वाद्यवृन्द की सम्मिलित ध्वनि बार-बार अन्तरतर से टकराने लगी और पलंग पर लेटे रहना असम्भव हो गया ।
कवि मृगांक की आत्मा विक्षुब्ध हो उठी ।
बिस्तरा छोड़कर बाहर निकल आये ।
एक राजस्थानी धनपति का नवनिर्मित प्रासाद था यह । सामने ठाकुरिया की मशहूर झील। पीछे लैन्सडाउन, रासबिहारी  एवेन्यू  आदि  इलाके, उच्चवर्गीय  आबादी वाले । तिनतल्ले  पर  आगे  की  तरफ  से  आमने  सामने  दो  बड़े  कमरे,  बीचो  बीच बरामदा ।
कवि जी बरामदे में चहलकदमी करने लगे ।
आहट पा कर नीचे, दुतल्ले पर छोटा कुत्ता हल्की आवाज में भांउ-भांउ करने लगा और अगले ही क्षण चुप हो गया । प्यार भरी फटकार सुनी तो मालकिन का अनुशासन उसने सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया ।
केन्द्रीय सरकार के किसी हिन्दी भाषा-भाषी मिनिस्टर को कलकत्ता के सेठों ने परसों शाम एक भारी-भरकम अभिनन्दन ग्रन्थ अर्पित किया था ।  समारोह  के क्षणों में आंखों और कानों की परितृप्ति के लिए मणि पुरी नृत्य....रवीन्द्र संगीत...काव्यपाठ आदि का समावेश प्रोग्राम के अन्दर ही था । तीन नर्तकियों, दो नर्तक, दो वादक, पांच गायक-गायिकाएं, तीन गीतकार और चार कवि... तीन-साढ़े तीन घंटे का प्रोग्राम रहा-भाषण-वाषण सहित ।
मृगांकजी आमन्त्रित कवियों में से थे ।
समारोह कुछ ऐसा मनहर लगा मृगांकजी को कि बस अगर अपने यहां दस वर्षों के भीतर तीन-चार प्रभावशाली मन्त्रियों को अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किये जा चुके थे न ! बाबू  नरपतसिंह  बच  गये  थे । आठ-नौ वर्ष पहले उनकी बरसगांठ मनाई थी मित्रों ने । लेकिन वह न तो जयन्ती थी, रजत था, न स्वर्ण ! कहां ? वह तो कुछ नहीं था । बस, यही हस्ब-मामूल पीले फूल कनेर के !
समारोह खत्म हुआ परसों रात साढे़ आठ बजे और मृगांकजी की निगाहें अपने नये निशाने पर जीम है...बाबू जी को इक्वायन हजार की थैली । पन्द्रह हजार अभिनन्दन-ग्रन्थ सोख लेगा । पांच हजार लग जायेंगे समारोह में । बची हुई निधि से एक-आध संस्था की बुनियाद डाली  जायेगी । ललनजी को जंच जाये तो दिल खोलकर साथ देंगे । फिर उनकी रामसागर बाबू से कैसी घुटती है । बाबू गोपीवल्लभ ठाकुर को भी यह प्रस्ताव पसन्द आयेगा । ये तीनों अपनी गुंजलक में समूची दुनिया को लपेट लेगें...लाख दो लाख क्या, यह  त्रिमूर्ति  कहीं  सचमुच  भिड़ गयी तो नम्बरी नोटों की वर्षा होने लगेगी । और फिर जादू सम्राट पी0सी0 सरकार दंग रह जायेंगे । सोचते-सोचते मृगांकजी का माथा गरम हो उठा ।
vani-prakashan अभिनन्दन :  नागार्जुन                             प्रस्तुति : डॉ. अमर कुमार
वाणी प्रकाशन
21-A दरियागँज, नयी दिल्ली - 110002
तृतीय सँस्करण ; 2009
© नागार्जुन



चिट्ठा चर्चा: हाशिये की शताब्दी और कोहबर की शर्त

13 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    तुम मांसहीन, तुम रक्त हीन, हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीऩ,
    तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुरान हे चिर नवीन !
    तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन,
    आधार अमर, होगी जिस पर, भावी संस्कृति समासीन।

    कोटि-कोटि नमन बापू, ‘मनोज’ पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  2. बहुत ही अच्छी समीक्षा ।

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  3. बहुत अच्छी लगी समीक्षा ...आभार

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  4. बाबा नागार्जन का काव्‍य ही कभी पाठ्य पुस्‍तकों में या कभी इधर-उधर टुकडों में पढते रहे हैं। लेकिन इस खुलासे और एक पेज नमूने के तौर पर पढने के बाद उनके लिखे गए गद्य को भी पढने की लालसा जाग गई है। अब बुक स्‍टाल या पुस्‍तकालायों में यह भी ध्‍यान में रहेगा।

    "उनकी पहचान सदैव एक आवेगशील, प्रगतिशील रचनाकार की रहेगी, आम जनता से एक अभिजात्य दूरी बनाये रखने की अपेक्षा वह कभी और किसी बिन्दु पर सामाजिक मुक्ति-सँघर्ष में अपनी हिस्सेदारी से नहीं चूके ।"


    बाबा नागार्जुन की हस्‍तलिपि की तस्‍वीर देकर आपने पोस्‍ट को और भी महत्‍वपूर्ण बना दिया है।

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  5. aapko badhai is khoobsoorat lekhi ke liye :)

    http://liberalflorence.blogspot.com/

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति। धन्यवाद।

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  7. बाबा नागार्जुन की भाषा का तीखापन उनकी पहर रचना में दिखता है. इस पोस्ट के लिए बधाई.

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  8. बहुत ही सुन्दर रचना . बधाई

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  9. अब उनकी ही पुस्तक खोजकर पढूँगी। जो डेढ पन्ने पढ़े वे भाए।
    पढ़वाने के लिए आभार।
    घुघूती बासूती

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  10. bahut badhiya !!nagarjun ki hastlipi men unki kavita padhne ko mili.

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  11. BAHI DHANYVAD , MAGAR BTAYA JAY KI BABA NAARJUN. KO KIS PUSTAK PAR SAHITY AKADEMI MITLA THA. ( YANHA YAH BATANA ACHHA HOGA KI MAITHILI ME AB TAK NAGARJUN NAM KA SAHITKAR NHI HUA HAIN.) KRIPYA ADHURI JANKARI NA DEN.

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