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Sunday, November 28, 2010

आवारा भीड के खतरे

"यह पुस्‍तक परसाई जी  के निधन के बाद उनके असंकलित और कुछेक अप्रकाशित व्‍यंग्य-‍निबंधों का संकलन है। हरशंकर परसाई देश के जागरुक प्रहरी रहे हैं, ऐसे प्रहरी जो खाने और सोनेवाले तृप्‍त आदमियों की जमात में हमेशा जागते और रोते रहे। उनकी रचनाओं में जो व्‍यंग है उसका उत्‍प्रेरक तत्‍व यही रोना है। शायद ही हिन्‍दी साहित्‍य की किसी अन्‍य हस्‍ती ने साहित्‍य और समाज में जड जमाने की कोशिश करती मरणोन्‍मुखता पर इतनी सतत, इतनी करारी चोट की हो। इसी वजह से इस लेखक की मृत्‍यु एक महत्‍वहीन सी घटना बन गई लगती है। मंथन की प्रक्रिया में परसाई उन लोगों पर गहरी निगाह रखते हैं जो उन सिद्धांतों के प्रवक्‍ता हैं। उनके यहॉं अंतर्विरोधों की पडताल निर्मम होती है। अपने समय की ज्‍वलंत समस्‍याओं के प्रति शासन, स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं, राजनीतिक दलों का जो नकली रवैया रहा आया है, उसकी फोटोग्राफी स्‍वतंत्र भारत में इतनी संजीदगी के साथ और कहॉं ?"

- पु‍स्‍तक की भूमिका "संग्रह के बारे में" से 




इस पुस्‍तक में 28 व्‍यंग्‍य लेख हैं। इनके रचनाकाल और विषय-वस्‍तु का दायरा काफी लम्‍बा-चौडा है। लेखों के शीर्षक इस प्रकार हैं:

#आवारा भीड के खतरे 
#सिद्धांतों की व्‍यर्थता
#हरजिन,मंदिर अग्निवेश
#समाजवाद और धर्म 
#वनमानुष नहीं हँसता
#तेरे वादे पे जिए हम ये तू जान भूल जाना
#महात्‍मा गॉंधी से कौन डरता ?
#क्‍या तिरुपति में नेहरू ने राज सिंहासन त्‍यागा
#उद्घाटन शिलान्‍यास रोग 
#विधायकों की बिक्री 
#ये क्‍या नमरूद की खुदाई थी 
#दर्द लेकर जाइए
#प्रवचन और कथा
#स्‍वस्‍थ सामाजिक हलचल और अराजकता
#भारतीय गणतंत्र-आशंकाऍं और आशाऍं
#टेलीविजन का निजी यर्था‍थ होता है
#आचार्य नरेंद्रदेव और समाजवादी आंदोलन
#अन्‍य भाषाओं में व्‍यंग्‍य मेरी प्रिय कहानियॉं 
#चेखव की दो कहानियॉ 
#डिकन्‍स के दिलचस्‍प पात्र
#दोस्‍तोवस्‍की, मुक्तिबोध के प्रसंग में 
#साहित्‍य में प्रसिद्ध कुछ नारियॉं 
#टामस हार्डी और प्रेमचंद
#अमेरिका के कुछ राष्‍ट्रपति
#दक्षिण अफ्रीका में प्रकाश
#सन्‍नाटा बोलता है 

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प्रस्‍तु है कुछ रेखां‍कित पंक्तियॉं :


"मगर जो पीढी ऊपर की पीढी की पतनशीलता अपना ले क्‍योंकि वह सुविधा की है और उसमें सुख है तो वह पीढी कोई परिवर्तन नहीं कर सकती।"

"पर मैं देख रहा हूँ एक नई पीढी अपने से ऊपर की पीढी से अधिक जड और दकियानूसी हो गई है। यह शायद हताशा से उत्‍पन्‍न भाग्‍यवाद के कारण हुआ है। अपने पिता से अधिक तत्‍ववादी, बुनियाद परस्‍त (फंडामें‍टलिस्‍ट) लडका है। 

दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्‍वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड खतरनाक होती है। इसका उपयोग महत्‍वाकांक्षी खतरनाक विचारधारावाले व्‍यक्ति और समूह कर सकते हैं। इस भीड का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया था। यह भीड धार्मिक उन्‍मादियों के पीछे चलने लगती है। यह भीड किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उनमें उन्‍माद ओर तनाव पैदा कर दे। फिर इस भीड से विध्‍वंसक काम कराए जा सकते हैं। यह भीड फासिस्‍टों का हथियार बन सकती है। हमारे देश में यह भीड बढ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है। आगे इसका उपयोग सारे राष्‍ट्रीय और मानव मूल्‍यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है।"

                                                                                           -आवारा भीड के खतरे 
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हमारे देश में सबसे आसान काम आदर्शवाद बघारना है और फिर घटिया से घटिया उपयोगितावादी की तरह व्‍यवहार करना है।
- सिद्धांतों की व्‍यर्थता
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"डा. रामशरण शर्मा ने लिखा है कि उडीसा में कृष्‍ण भक्‍त राम मंदिर लूटते थे और राम भक्‍त कृष्‍ण मंदिर लूटते थे। मंदिर बैंक थे। अब भी मंदिर खजाने हैं। यह कहना गलत है कि सिर्फ मुसलमान नवाब मंदिर लूटते थे और वह भी धार्मिक द्वेष के कारण नहीं धन के लिए लूटे जाते थे। गैर मुसलमान भी मंदिर लुटवाते थे। खजाने में धन की कमी हुई तो हुक्‍म दिया कि अमुक मंदिर लूट लाओ। मुसलमान, नवाबों, शाहों का कोई मंदिर लूटने का डिपार्टमेंट नहीं था। पर हर्ष के शासन में मंदिर लूटने का एक विभाग था, जिसका संस्‍कृत नाम मैं भूल रहा हूँ।"

"पूजास्‍थल भव्‍य इमारते हैं, धर्म नहीं हैं। सच्‍चा  धर्म भावना और आचरण में होता है। जिसे सर्वव्‍यापी माना जाता है, वह मंदिर या मस्जिद कैद नहीं है।"

"पुनरुत्‍थानवाद से पुनरुत्‍थानवाद के हथियार से नहीं लडा जा सकता। आज जो प्रश्‍न है उस पर बहस आज के संदर्भ में ही हो सकती है। पुराने ग्रंथों में उसका हल नहीं खोजा जाना चाहिए। शास्‍त्रार्थ करने के लिए हमारे यहॉं संसद है, विधान सभाऍ हैं।"

- हरजिन, मंदिर, अग्निवेश
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"भारतीय जन के द्वारा निर्वाचित सरकार के मंत्रियों का यह हाल ? वे समझते हैं कि इस देश के मनुष्‍य खाद हैं, और इस खाद से वे फूल की तरह बढते और खिलते हैं।"

"इस वर्ग को भारतीय हो जाना भी शर्म की बात लगती है।"

- तेरे वादे पे जिए हम ये तू जान भूल जाना
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"आजादी के बाद ऐसा होने लगा कि वे लोग जो आजादी के संघर्ष से दूर रहे, सबसे उँची आवाज में राष्‍ट्रप्रेम और राष्‍ट्रभक्ति को उठाने लगे। इससे भी आगे बढकर उन्‍हें राष्‍ट्रद्रोही कहने लगे, जिन्‍होंने राष्‍ट्र के लिए संघर्ष और बलिदान किए थे।"

       - महात्‍मा गांधी से कौन डरता है
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"मगर मंत्रीजी ने मुस्‍कुराते हुए मालाऍं पहनी और ऐसे विश्‍वास से भाषण दिया जैसे उन्‍होंने स्‍कूल की इमारत खा ली हों"

"यह सच है कि एक प्रदेश के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री अस्‍पताल का मुआइना करने गए। मरीज का हाल पूछा। फिर डाक्‍टर से कहा - इसकी ''पोस्‍टमार्टम' रिपोर्ट कहाँ है। " 

"अब त्‍याग की राजनीति खत्‍म हो चुकी थी, प्राप्ति की राजनीति आ चुकी थी। जो त्‍याग की राजनीति में दुबले थे, वे प्राप्ति की राजनीति में मोटे हो गए।"

  - उद्घाटन शिलान्‍यास रोग 
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"यह नौकरशाही ऐसी है कि भिखारी से भी भीख मॉंग लेती है। उसका भीख का कटोरा ले लेती है।"

- दर्द लेकर जाइए 
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"कौन हलचल, बेचैनी यथास्थिति को तोडनेवाली और कल्‍याणकारी है यह पहचानना होता है। बेचैनी, हलचल, उन्‍माद कोई स्‍वार्थी सत्‍ता के इच्‍छुक या पागल भी इतने पैदा कर सकते हैं कि पूरी जाति एक पागल  के पीछे चलकर दुनिया का और अपना खुद का बहुत नाश करती है। दूसरे महायुद्ध का कारण हिटलर की गलत सोच, महत्‍वाकांक्षा और सनकीपन थे। पर उसमें जाति को उन्‍मादग्रस्‍त करने की अद्भुत क्षमता थी"

"जड को खाजने में कोई हर्ज नहीं। पर अब जब पेड हो गए हैं, तब फिर जड होने की कोशिश करने के क्‍या नतीजे निकलेंगे ? एक तो यह संभव नहीं है। इससे सिर्फ मा‍नसिकता जड होगी। कबीलाई जिंदगी अब नहीं जी सकते।" 

- स्‍वस्‍थ सामाजिक हलचल और अराजकता
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"एक बंधु परेशान आए थे। साहित्यिक हैं। परेशानी साहित्‍य की कसरत है। जब देखते हैं, ढीले हो रहे हैं, परेशानी के दंड पेल लेते हैं। मांसपेशियां कस जाती हैं।"

"यों तो प्रयाग में भी सरस्‍वती 'अंडरग्राउंड' ही रहीं है" पंडों के डर से। 

"सुनते हैं दिल्‍ली में दो लेखकों में गाल-गलौज हो गई तो हम फौरन जूता उठाकर शहर में किसी लेखक की तलाश में निकल पडते हैं" 

"मैंने बताया कि इस तरह के कामों से सन्‍नाटा मिटता है। कोई झगडा हो, कोई टॉंग खींच का खेल हो, प्रतिभा हनन हो, निंदा गोष्‍ठी हो, अभियान हो - तो सन्‍नाटा मिटता है"

"इस मुगालते में जीना कितना सुखद है कि शहर मेरे भीतर है। मैं जब काफी हाउस में किसी कविता को घटिया कहता हूँ तब मेरे जेब में पडा शहर सुनता रहता है।"

                                                                                    - सन्‍नाटा बोलता है 
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पहला पुस्‍तकालय संस्‍करण 1998 में प्रकाशित

राजकमल पेपरबैक्‍स में
पहला संस्‍करण : 2004
दूसरी आवृत्ति     : 2010
(C) प्रकाशचंद दुबे

 पृ. 172 , मूल्‍य 55/-

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यह लेख आप यहॉं भी पढ सकते हैं http://hindini.com/fursatiya/archives/132

7 comments:

  1. परसाई जी का लिखा हुआ जितनी बार पढ़ता हूं उतनी बार आज के समय में उनकी कमी खलती है। यह लेख मैंने उनकी इसी पुस्तक से लेकर पोस्ट किया था। आप लेख में इसका लिंक दे सकते हैं:

    http://hindini.com/fursatiya/archives/132

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  2. आप बिल्‍कुल सही कह रहे हैं। परसाई जी को पढने पर आज के हालातों पर उनकी कमी खलती है। इस लेख में आपका लिंक लगा रहे हैं।विकीपीडिया में भी, आपकी साइट के लिंक है जिसे हमने परसाई शब्‍द पर हाइपरलिंक किया है।
    शुक्रिया ।

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  3. जब कभी व्यवस्था की नाव हिचकोले खाने लगती है तो परसाई जी को पढ़ना न केवल सकून देता है बल्कि यह अचरज भी होता है कि घटना तो आज घटी उन्होने इतने पहले कैसे लिख दिया..!

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  4. आपने बड़े जतन से महत्त्वपूर्ण बातों को यहां पिरोया है।
    अच्छा प्रस्तुतिकरण।
    शुक्रिया।

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  5. बढ़िया परिचयात्मक आलेख... यह कार्य जारी रखें...शुभकामनाएं.

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  6. आपको क्रिसमस की शुभकामनाये

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