"यह पुस्तक परसाई जी के निधन के बाद उनके असंकलित और कुछेक अप्रकाशित व्यंग्य-निबंधों का संकलन है। हरशंकर परसाई देश के जागरुक प्रहरी रहे हैं, ऐसे प्रहरी जो खाने और सोनेवाले तृप्त आदमियों की जमात में हमेशा जागते और रोते रहे। उनकी रचनाओं में जो व्यंग है उसका उत्प्रेरक तत्व यही रोना है। शायद ही हिन्दी साहित्य की किसी अन्य हस्ती ने साहित्य और समाज में जड जमाने की कोशिश करती मरणोन्मुखता पर इतनी सतत, इतनी करारी चोट की हो। इसी वजह से इस लेखक की मृत्यु एक महत्वहीन सी घटना बन गई लगती है। मंथन की प्रक्रिया में परसाई उन लोगों पर गहरी निगाह रखते हैं जो उन सिद्धांतों के प्रवक्ता हैं। उनके यहॉं अंतर्विरोधों की पडताल निर्मम होती है। अपने समय की ज्वलंत समस्याओं के प्रति शासन, स्वयंसेवी संस्थाओं, राजनीतिक दलों का जो नकली रवैया रहा आया है, उसकी फोटोग्राफी स्वतंत्र भारत में इतनी संजीदगी के साथ और कहॉं ?"
- पुस्तक की भूमिका "संग्रह के बारे में" से
