बाबा नागार्जुन की अप्रतिम व्यँग्य रचना ’ अभिनन्दन ’ पढ़ना अपने आपमें एक अनुभव है । साहित्यजगत विशेषकर हिन्दी साहित्यकारों के मध्य चलते घाल मेल और अभिनन्दन, सम्मानों के आँतरिक सत्य को बेरहमी और चुटीले ढँग से इस उपन्यास में उकेरते हैं, बाबा नागार्जुन । ऎसा नहीं है कि नागार्जुन हिन्दी-रचनाकारों के किसी असँतुष्ट घड़े से सम्बन्ध रखते रहे हों, और यह पुस्तक उनके असँतोष की कुँठा की उपज हो ।साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत बाबा नागार्जुन ने सम्मान, अलँकरण की परवाह कभी से न की ! श्री वैद्यनाथ मिश्र ( 1911-1998 ) छपासग्रस्त भी न थे, लेखक के रूप में वह हिन्दी में नागार्जुन, मैथिली में यात्री और बाँग्ला में बैजनाथ के नाम को अमर कर गये । उनकी पहचान सदैव एक आवेगशील, प्रगतिशील रचनाकार की रहेगी, आम जनता से एक अभिजात्य दूरी बनाये रखने की अपेक्षा वह कभी और किसी बिन्दु पर सामाजिक मुक्ति-सँघर्ष में अपनी हिस्सेदारी से नहीं चूके ।
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Thursday, October 7, 2010
अभिनन्दन का उद्योग-पर्व
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