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Wednesday, October 20, 2010

हिन्दी में आंचलिक औपन्यासिक परंपरा की सर्वश्रेष्ठ कृति “मैला आंचल”

हिन्दी में आंचलिक औपन्यासिक परंपरा की सर्वश्रेष्ठ कृति “मैला आंचल”

मनोज कुमार

1954 में प्रकाशित फणिश्‍वरनाथ ‘रेणु’ का “मैला आंचल” हिन्दी साहित्य में आंचलिक उपन्यास की परंपरा को स्थापित करने का पहला सफल प्रयास है। हालाकि नागार्जुन ने रेणु से पहले लिखना शुरु किया। उनके ‘रतिनाथ की चाची’ (1949), ‘बलचनमा’, (1952), ‘नई पौध’ (1953) और ‘बाबा बटेसरनाथ’ (1954) में भी आंचलिक परिवेश का चित्रण हुआ है।
वैसे देखा जाए तो 1925 में प्रकाशित शिवपूजन सहाय के ‘देहाती दुनिया’ में भोजपुरी जनपद का चित्रण बहुत ही मनभावन तरीक़े से हुआ है। हम मान सकते हैं कि आंचलिक उपन्यास परंपरा का यह पहला उपन्यास है। 1952 में प्रकाशित शिवप्रसाद रुद्र का ‘बहती गंगा’ भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। अन्य आंचलिक उपन्यासों में उदयशंकर भट्ट के ‘सागर, लहरें और मनुष्य’ (1955), रांगेय राघव के ‘कब तक पुकारूं’ (1958) और ‘मुर्दों का टीला’, देवेन्द्र सत्यार्थी के ‘ब्रह्मपुत्र’ (1956) और ‘दूध छाछ’, राजेन्द्र अवस्थी के ‘जंगल के फूल’, शैलेश मटियानी के ‘हौलदार’ (1960), रामदरश मिश्र के ‘पानी की प्राचीर’, शिवप्रसाद सिंह के ‘अलग अलग वैतरणी’, श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’, अमृतलाल नागर के ‘बूंद और समुद्र’ (1956), बलभद्र ठाकुर के ‘मुक्तावली’, हिमांशु श्रीवास्तव के ‘लोहे के पंख’, राही मासूम रज़ा के ‘आधा गांव’, मनहर चौहान के ‘हिरना सांवरी’, केशव प्रसाद मिर के ‘कोहवर की शर्त’, भैरव प्रसाद गुप्त के ‘गंगा मैया’, विवेकी राय के ‘लोक ऋण’, हिमांशु जोशी के ‘कमार की आग’, कृष्णा सोबती के ‘ज़िंदगीनामा’, ‘मितरो मरजानी’, जगदीश चंद्र के ‘कभी न छोड़े खेत’, बलवंत सिंह के ‘शत चोर और चांद’, आदि में और रेणु के भी अन्य उपन्यास जैसे ‘परती परिकथा’(1958), ’जुलूस’, ‘दीर्घतपा’, ‘कलंक मुक्ति’, व ‘पलटू बाबू रोड’ में अंचल विशेष के सजीव चित्र प्रस्तुत  हुए हैं।

Monday, October 18, 2010

लस्‍ट फॉर लाइफ


महान चित्रकार वॉन गॉग के जीवन पर आधारित विश्‍वप्रसिद्ध उपन्‍यास 

वॉन गॉग के अंतिम चित्र से बातचीत

एक पुराने परिचित चेहरे पर 
न टूटने की पुरानी चाह थी
आंखे बेधक तनी हुई नाक
छिपने की कोशिश करता था कटा हुआ कान
दूसरा कान सुनता था दुनिया की बेरहमी को 
व्‍यापार की दुनिया में वह आदमी प्‍यार का इंतजार करता था 

मैंने जंगल की आग जैसी उसकी दाढी को छुआ
उसे थोडा-सा क्‍या किया नहीं जा सकता था काला
ऑखें कुछ कोमल कुछ तरल
तनी हुई एक हरी नस जरा सा हिली जैसे कहती हो तुम 
हम वहां चलकर नही जा सकते 
वहां आंखों को चौंधियाता हुआ यथार्थ है और अंधेरी हवा है 
जनम लेते हैं सच आत्‍मया अपने कपडे उतारती है
और हम गिरते हैं वहीं बेदम 
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'लस्‍ट फॉर लाइफ' एक ऐसे चित्रकार की उपन्‍यासात्‍मक जीवनी है,  जिसका नाम आज इतिहास में दर्ज है। जो माडर्न आर्ट को स्‍थापित करने वाले चित्रकारों में से प्रमुख है। जिसका नाम लिए बिना आ‍धुनिक चित्र कला की बात नहीं की जा सकती। 

Saturday, October 16, 2010

गद्य में गीत और संगीत

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नमस्कार मित्रों!   मैं मनोज कुमार एक बार फिर पुस्तकायन पर हाज़िर हूं!
आज की बात मैं अपने एक संस्मरण से शुरु करता हूं। एक बार मैं पुर्णिया से सहरसा होते हुए अपने घर समस्तीपुर आ रहा था। ट्रेन में झपकी लग गई। तब, जब आप आधा सोए और ज़्यादा जगे होते हैं, तो अगल-बगल के लोगों की बातें छन-छन कर कानों में पड़ती रहती है और आप उस माहौल में नहीं रहकर भी उसका हिस्सा बने होते हैं।
ऐसी ही स्थिति में मेरे कानों में यह संवाद पड़ा -----
हौ! चाह ही पी लेते हैं। हो चाह बाला, एगो चाह दीजिए।”
“………”
“हे रौ! तों-हों पीबही कि ….?”
“आहिरौ बाप! केहन-केहन लोग सब पिबई छई, हम्मर मुंह की तिन कोनमा छई जे नई पीबई!”
“हो! दहो एकरो!!”
“बाबू फूल लीजिएगा के हाफ?”
“तोरा की बुझाई छौ …..?”
“हे-हौ! केतलीए के टोंटी लगा दहौ नय मूहें में, मन भैर पी लेतए!”
जी! यह है हमारा अंचल!! आज इस अंचल विशेष पर लिखी एक पुस्तक पढते वक़्त यह वाकया याद आ गया। …..

Thursday, October 7, 2010

अभिनन्दन का उद्योग-पर्व

बाबा नागार्जुन की अप्रतिम व्यँग्य रचना ’ अभिनन्दन ’ पढ़ना अपने आपमें एक अनुभव है । साहित्यजगत विशेषकर हिन्दी साहित्यकारों के मध्य चलते घाल मेल और अभिनन्दन, सम्मानों के आँतरिक सत्य को बेरहमी और चुटीले ढँग से इस उपन्यास में उकेरते हैं, बाबा नागार्जुन । ऎसा नहीं है कि नागार्जुन हिन्दी-रचनाकारों के किसी असँतुष्ट घड़े से सम्बन्ध रखते रहे हों, और यह पुस्तक उनके असँतोष की कुँठा की उपज हो ।-Nagarjun साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत बाबा नागार्जुन ने सम्मान, अलँकरण की परवाह  कभी से न की !  श्री वैद्यनाथ मिश्र ( 1911-1998 ) छपासग्रस्त भी न थे,  लेखक के रूप में वह हिन्दी में नागार्जुन, मैथिली में यात्री और बाँग्ला में बैजनाथ के नाम को अमर कर गये ।  उनकी पहचान सदैव एक आवेगशील, प्रगतिशील रचनाकार की रहेगी, आम जनता से एक अभिजात्य दूरी बनाये रखने की अपेक्षा वह कभी और किसी बिन्दु पर सामाजिक मुक्ति-सँघर्ष में अपनी हिस्सेदारी से नहीं चूके ।


वाणी प्रकाशन को इसे छापने की अनुमति देते हुये  (उनकी अपनी हस्तलिपि में) उन्होंनें स्वयँ ही लिखा है, कि. Image0001अस्तु यहाँ प्रस्तुत है, उनके उपन्यास ’ अभिनन्दन ’ के  प्रथम अध्याय उद्योग-पर्व का आरँभिक डेढ़ पेज...

Monday, September 13, 2010

एक करोड की बोतल

इस उपन्‍यास के माध्‍यम से हम 'एक गधे की आत्‍मकथा' लिखने वाले, उर्दू कथा साहित्‍य में अपनी अनूठी रचनाशीलता के लिए बहुचर्चित उपन्‍यासकार, प्रगतिशील और य‍थार्थवादी नजरिए से लिखे जानेवाले साहित्‍य के प्रमुख पक्षधरों में से एक, कृष्‍नचंदर के लेखन से परिचित हुए। (पुस्‍तक के परिचय से)

इस पुस्‍तक का पेपरबैक संस्‍करण जो कि मूल पुस्‍तक की अविकल प्रस्‍तुति होने का दावा करता है, कहीं रास्‍ते में किसी स्‍टेशन से खरीदी गई थी। 

उपन्‍यास मुम्‍बई नगरिया की दो बिल्‍कुल धुर असमान जीवन स्‍तर का बहुत ही खूबसूरती से चित्रण करता है। कथा की नायिका झुग्‍गी बस्‍ती की गरीबी से अचनाक नाटकीय ढंग से एक करोडपति आदमी की बेटी की समस्‍त सुविधाऍं और वसीयत पा जाती है। यही कहानी का प्रस्‍थान बिंदु है। 

Monday, August 9, 2010

फटीचर और ठाठदार दिखने के बीच चालीस पैसे का फर्क है

मकान (उपन्‍यास)
पहला संस्‍करण - 1976 
सातवीं आवृत्ति - 2004 

प्रकाशक 
राधाकृष्‍ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 
जी - 17, जगतपुरी, दिल्‍ली - 110051
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यह वाक्‍य है, श्रीलाल शुक्‍ल के उपन्‍यास 'मकान' का ।  कुछ ऐसे लेखक होते हैं जिन्‍हें पढते समय आप कभी बोर नहीं होते ।  उनका अंदाज ही ऐसा होता है कि आप चाहे उनकी प्रारंभिक रचनाऍं पढें या लोकप्रिय होने लीजेन्‍ड बनने के बाद की, कभी बोरियत महसूस नहीं होती । श्रीलाल शुक्‍ल ऐसे ही लेखक हैं । इनकी मास्‍टर पीस 'रागदरबारी'  से तो आप परिचित होंगे ही ।

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